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दिलचस्प मोड पर उत्तराखंड की सियासत, क्या प्रदेश में फिर बदल जाएंगे सीएम..?

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उत्तराखण्ड की सियासत में मची उठापटक पर वरिष्ठ पत्रकार दीपक फर्सवाण की फेसबुक वॉल से-

राजनीति मनोवैज्ञानिक बढ़त का खेल है। समय रहते जिसने ये बढ़त बना ली समझो आधी जंग जीत ली। उत्तराखण्ड में आम आदमी पार्टी ने इस सियासी तिकड़म को भांपते हुए सनसनीखेज तरीके से उपचुनावी ताल ठोक दी है। वो भी उस वक्त जब राज्य में सत्ता पक्ष ही नहीं बल्कि विपक्ष भी सियासी अस्थिरता से जूझ रहा है। दोनों ही दलों में ये अंदरूनी संकट राजनेताओं की आपसी गुटबाजी और अतिमहत्वकांक्षा से उपजा हुआ है।
मौजूदा समय में उत्तराखण्ड की राजनीति दिलचस्प मोड़ पर हैं। सत्ताधारी दल भाजपा और विपक्षी दल कांग्रेस खुद की उलझनों को सुलझाने में लगे हुए हैं। अदूरदर्शिता की वजह से भाजपा अजीबोगरीब संवैधानिक संकट से जूझ रही है। संकट इतना अजीब है कि मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को उपचुनाव लड़ने के लाले पड़ गए हैं। तीरथ कुछ समय पहले हुए सल्ट विधानसभा के उपचुनाव को लड़ने की हिम्मत जुटा लेते तो फिर इस तरह की नौबत नहीं आती। अब स्थितियां ऐसी बन गई हैं कि भाजपा तीरथ को हटाकर उत्तराखण्ड को नया मुख्यमंत्री देने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही है।

पार्टी में अंदरूनी उठापटक से भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता दिख रहा है। सवाल उठ रहा है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 70 में से 57 सीटों का प्रचण्ड बहुमत देने के बाद भी उत्तराखण्ड को क्या मिला ? जरूरत से ज्यादा बहुमत होने के बावजूद पहले त्रिवेन्द्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया और अब तीरथ को हटाए जाने की स्थिति बन गई है। मौजूदा परिस्थिति में जनाकांक्षा, जनसरोकार और जनहित हासिए पर जाता दिख रहा है। ठीक ऐसे समय में विपक्ष भी मुखर होने के बजाए भीतरी संकट का सामना कर रहा है। प्रदेश में विरोधी दल कांग्रेस के कुल जमा 10 विधायक हैं। नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश के आकस्मिक निधन के बाद अंगुली में गिने जाने वाले ये विधायक भी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पाने को एक-दूसरे की टांग खिंचाई कर रहे हैं। पार्टी हाईकमान से मिले प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बदले जाने के संकेतों ने कांग्रेस के इस संकट को और पेंचीदा बना दिया है। हरीश रावत का खेमा इन दोनों अहम पदों पर अपना कब्जा चाहता है।

वर्चस्व की इस लड़ाई में कांग्रेस के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के सधे कदम हरीश खेमे को सीधी चुनौती पेश कर रहे हैं जिस वजह से इस लड़ाई में रोचकता आ गई है। लम्बे खिंच रहे संकट से यह साफ हो गया है कि इंदिरा हृदयेश के निधन के बावजूद प्रीतम सिंह कतई कमजोर नहीं हुए हैं। दून से दिल्ली तक उनका कद और प्रभाव पहले से बढ़ा है। अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि सत्ताधारी और विरोधी दल दोनों अचानक उपजे सियासी संकटों का सामना कर रहे हैं।

इधर, मौके का फायदा उठाने की फिराक में बैठी आम आदमी पार्टी इसे खुद के लिए सुनहरा अवसर मान रही है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के खिलाफ अपने सीएम कैंडिडेट कर्नल अजय कोठियाल को उपचुनाव लड़ाने का ऐलान करके आप ने सियासी सनसनी मचाने में कोई देर नहीं की। साफ है कि आम आदमी पार्टी उत्तराखण्ड में दिल्ली जैसा इतिहास दोहराना चाहती है। वर्ष 2013 में दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ा जहां उनकी सीधी टक्कर 15 साल से लगातार दिल्ली की मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित से थी। उन्होंने नई दिल्ली विधानसभा सीट से तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 25864 मतों से हराया और अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने दिल्ली की राजनीति में धमाकेदार एंट्री की थी। आम आदमी पार्टी ने 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतकर प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी, भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई।

Photo- Social Media

हालांकि इसके बाद वर्ष 2015 के दिल्ली विधान सभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उनकी पार्टी ने 70 में से रिकॉर्ड 67 सीटें जीत कर भारी बहुमत हासिल किया और वह दोबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए। यही इतिहास उत्तराखण्ड में दोहराने के लिए आप ने कर्नल कोठियाल को मुख्यमंत्री तीरथ के खिलाफ उपचुनाव लड़ाने का फैसला किया है। दरअसल, उत्तराखण्ड में आप के पास खोने को कुछ नहीं है। यदि कर्नल कोठियाल मुख्यमंत्री को उपचुनाव में हरा देते हैं तो आप की लोकप्रियता का ग्राफ आसमान छूने लगेगा जो उन्हें वर्ष 2022 के आम चुनाव में संजीवनी का काम कर सकता है।

कर्नल उपचुनाव हारे भी तो आप इसे उनके साहसिक कदम के तौर पर प्रचारित करेगी। फिलहाल उत्तराखण्ड की जनता राजनैतिक दलों की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। चुनाव आने में अभी थोड़ा लेकिन अहम वक्त शेष है। इस दौरान सियासत क्या गुल खिलाती है, इसे लेकर सभी की दिलचस्पी है।