Home उत्तराखंड जागेश्वर धाम, भगवान शिव को समर्पित मंदिरों का एक समूह।

जागेश्वर धाम, भगवान शिव को समर्पित मंदिरों का एक समूह।

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उत्तराखण्ड़ में विभन्न धार्मिक स्थल हैं, जहां भगवान के विभिन्न रुपों की पूजा की जाती है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है जागेश्वर धाम।जो न केवल धार्मिक आस्था बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण स्थल है। उत्तराखंड में वास्तुकला के बेहतरीन उदाहरणों में से एक, जागेश्वर धाम भगवान शिव को समर्पित मंदिरों का एक समूह है। यहां 124 बड़े और छोटे मंदिर हैं जो हरे पहाड़ों कि पृष्ठभूमि और जटा गंगा धारा कि गड़गड़ाहट के साथ बहुत खूबसूरत व सुंदर दिखते हैं। इस धाम को भगवान शिव का पवित्र धाम माना जाता है।जागेश्वर धाम में सारे मंदिर केदारनाथ शैली से बने हुए हैं।यहां के मंदिर करीब 2500 वर्ष पुराने माने जाते हैं। अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर को भगवान शिव की तपस्थली के रूप में भी जाना जाता है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि गुरु आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ के लिए प्रस्थान करने से पहले जागेश्वर के दर्शन किए और यहां कई मंदिरों का जीर्णोद्धार और पुन: स्थापना भी की थी। पुराणों के अनुसार भगवान शिव एवं सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं, जिसका भारी दुरुपयोग होने लगा। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। अब यहां सिर्फ यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।पौराणिक मान्यताओं में जागेश्वर धाम के बारे में यह भी कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने के बाद सती के आत्मदाह से दु:खी भगवान शिव ने यज्ञ की भस्म लपेट कर दायक वन के घने जंगलों में दीर्घकाल तक तप किया. इन्हीं जंगलों में वशिष्ठ आदि सप्त ॠषि अपनी पत्नियों सहित कुटिया बनाकर तप करते थे. शिव जी कभी दिगंबर अवस्था में नाचने लगते थे. एक दिन इन ॠषियों की पत्नियां जंगल में कंदमूल, फल एवं लकड़ी आदि के लिए गईं तो उनकी दृष्टि दिगंबर शिव पर पड़ गई. सुगठित स्वस्थ पुरुष शिव को देखकर वे अपनी सुध-बुध खोने लगीं. अरुंधती ने सब को सचेत किया, किंतु इस अवस्था में किसी को अपने ऊपर काबू नहीं रहा. शिव भी अपनी धुन में रमे थे, उन्होंने भी इस पर ध्यान नहीं दिया. ॠषि पत्नियां कामांध होकर मूर्छित हो गईं. वे रात भर अपनी कुटियों में वापस नहीं आईं तो प्रात: ॠषिगण उन्हें ढूंढने निकले. जब उन्होंने यह देखा कि शिव समाधि में लीन हैं और उनकी पत्नियां अस्त-व्यस्त मूर्छित पड़ी हैं तो उन्होंने व्याभिचार किए जाने की आशंका से शिव को श्राप दे डाला और कहा कि तुम्हारा लिंग तुरंत तुम्हारे शरीर से अलग होकर गिर जाए।लिंग के शिव से अलग होते ही संसार में त्राहि-त्राहि मच गई, ब्रह्मा जी ने संसार को इस प्रकोप से बचाने के लिए ॠषियों को मां पार्वती की उपासना का सुझाव देते हुए कहा कि शिव के इस तेज को पार्वती ही धारण कर सकती हैं।ॠषियों ने पार्वती जी की उपासना की, पार्वती ने  प्रकट होकर शिवलिंग को धारण किया, इस शिवलिंग को योगेश्वर शिवलिंग के नाम से पुकारा गया तभी से यहां शिवलिंग की पूजा की जाती है।