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जै दिन तैर मैरो नी होलो, जै दिन नान ठुलो नी रैलो, जैंता इक दिन तो आलो….।

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जनकवि गिरीश चन्द्र तिवाड़ी ‘गिर्दा’ आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके गाये गीत, कविताएं और जनसंघर्ष के लिए किए गए नुक्कड नाटक गिर्दा को जानने वालों के दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे। गिरीश चन्द्र तिवाड़ी वह शख्स थे, जिन्होंने अपने पहाड़ के हक के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ी। ऐसे जनगीत रचे, जो आंदोलनकारियों के लिए हौंसला बने। उन्होंने खुद भी आगे बढ़कर जन अपेक्षाओं की मशाल उठाई और उनका  संघर्ष रंग लाया तथा अलग उत्तराखण्ड राज्य बना।

गिर्दा की आज दसवीं पुण्ण तिथि है। 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा जिले के हवालबाग ब्लॉक अंतर्गत ज्योली गांव में जन्मे गिर्दा आजीवन जन संघर्षों से जुड़े रहे और अपनी कविताओं में जन पीड़ा को सशक्त अभिव्यक्ति दी। 22 अगस्त 2010 हल्द्वानी में गिर्दा इस दुनिया को अलविदा कह गए।

लखनऊ की सड़कों पर रिक्शा खींचने के बाद गिर्दा ने आन्दोलन की ऐसी राह पकड़ी कि वह उत्तराखंण्ड मे आन्दोलनों के पर्याय ही बन गये, उन्होंने जनगीतों से लोगो को अपने हक-हकूको के लिये ना सिर्फ लड़ने की प्रेरणा दी, बल्कि परिवर्तन की एक नयी आस भी जगाई। उत्तराखंड के 1977 में चले वन बचाओ आन्दोलन, 1984 के नशा नहीं रोजगार दो ,और 1994 में हुये उत्तराखंड आन्दोलन में गिर्दा की रचनाओं ने जान फूंकी थी।

गिर्दा ने अपने गीतों, कविताओं से उत्तराखण्ड़ में समय-समय पर चले आंदोलनों चिपको आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन को नई धार दी। उनके गीतों में वह ताकत थी की वह अपने गीतों से सोए और निष्क्रिय पड़े लोगों को झकझोरने और सोचने को विवश कर देते थे।

गिर्दा ने कई नाटकों का निर्देशन भी किया जिनमें से अन्धा युग, अंधेर नगरी, थैंक यू मिस्टर ग्लैड और भारत दुर्दशा प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नगाड़े खामोश हैं और धनुष यज्ञ लिखे भी। उनके द्वारा लिखे गाये गीत व कविताएं उत्तराखंड आंदोलन और उत्तराखंड काव्य नाम से सन 2002 में प्रकाशित हो चुकी हैं। गिर्दा आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन एक रंगकर्मी, जनकवि, लोकविद् और आंदोलनकारी के रूप में पहाड़ के लोगों को गिर्दा की कमी हमेशा खलती रहेगी। गिर्दा की पुण्यतिथि पर उत्तराखण्ड में उनको श्रद्धांजलि देने के लिए कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।