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जन्मदिव विशेष- तीलू रौतेली 15 साल की उम्र में युद्ध लड़ने वाली वीरांगना।

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उत्तराखण्ड में गढ़वाल की लक्ष्मीबाई नाम से मशहूर तीलू रौतेली का जन्म आज ही के दिन 1661 को ग्राम गुराड़, चौंदकोट (पौड़ी गढ़वाल) के भूप सिंह रावत (गोर्ला) और मैणावती रानी के घर में हुआ था। उनके जन्म दिवस के अवसर पर प्रदेश सरकार विभिन्न क्षेत्रों में उतकृष्ट करने वाली महिलाओं को सम्मानित करती है। राज्य में तीलू रौतेली के नाम से कई योजनाएं भी संचालित की जाती हैं।

तीलू रौतेली एक ऐसा नाम है जो रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, चांदबीबी, जियारानी जैसी पराक्रमी महिलाओं में अपना एक उल्लेखनीय स्थान रखता है। 15 से 20 वर्ष की आयु के बीच सात युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली संभवत विश्व की एक मात्र वीरांगना है।

तीलू रौतेली ने अपने बचपन का अधिकांश समय बीरोंखाल के कांडा मल्ला गांव में बिताया। भूप सिंह गढ़वाल नरेश फतहशाह के दरबार में सम्मानित थोकदार थे। तीलू के दो भाई भगतु और पत्वा थे। 15 वर्ष की उम्र में ईडा, चौंदकोट के थोकदार भूम्या सिंह नेगी के पुत्र भवानी सिंह के साथ धूमधाम से तीलू की सगाई कर दी गई।

उस काल में गढ़वाल के पूर्वी सीमान्त के गांवों पर कुमाऊँ के पश्चिमी क्षेत्रों के कत्यूरी वर्ग के लोग बवाल मचाये रखते थे। कत्यूरी नरेश धामदेव ने जब खैरागढ़ पर आक्रमण किया तो गढ़नरेश मानशाह वहां की रक्षा की जिम्मेदारी भूप सिंह को सौंपकर स्वयं चांदपुर गढ़ी में आ गया। भूप सिंह ने डटकर आक्रमणकारियों का मुकाबला किया परंतु इस युद्ध में वे अपने दोनों बेटों और तीलू के मंगेतर के साथ वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गए।

कुछ ही दिनों में कांडा गांव में कौथिग लगा, तीलू ने अपनी माता से उस में जाने की इच्छा व्यक्त की। तीलू द्वारा कौथिग में जाने की बात सुनकर उसकी मां को कत्यूरों द्वारा मारे गए अपने पति व दो पुत्रों की याद आ गई। उसने तीलू से कहा, यदि आज मेरे पुत्र जीवित होते तो एक न एक दिन वे इन कैंतुरों से अपने पिता की मौत का बदला अवश्य लेते। मां के मर्माहत वचनों को सुनकर उसने कत्यूरियों से प्रतिशोध लेने तथा खैरागढ़ सहित अपने समीपवर्ती क्षेत्रों को आक्रमणकारियों से मुक्त कराने का प्रण किया।

तत्पश्चात अगले सात वर्षों तक वह कत्यूरी योद्धाओं से युद्ध लड़ती रही, पुरुष वेश में तीलू ने छापामार युद्ध में सबसे पहले खैरागढ़ को कत्यूरियों से मुक्त कराया। खैरागढ़ से आगे बढ़कर उसने उमटागढ़ी को जीता। इसके पश्चात वह अपने दल-बल के साथ सल्ट महादेव जा पहुंची। सराईंखेत वापसी में घर लौटते हुए एक दिन तल्ला कांडा शिविर के निकट पूर्वी नयार नदी तट पर तीलू स्नान कर रही थी कि तभी शत्रु के एक सैनिक रामू रजवार ने धोखे से तीलू पर तलवार का वार कर दिया। कांडा और बीरोंखाल इलाके में हर वर्ष तीलू की स्मृति में एक मेले का आयोजन  होता है, और पारंपरिक वाद्यों  के साथ जुलूस निकालकर उसकी मूर्ति की पूजा की जाती है।

उत्तराखण्ड सरकार भी हर वर्ष तीलू रौतेली के जन्मदिवस के अवसर पर कई कार्यक्रम आयोजित करती है। हर वर्ष विशिष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष भी 21 महिलाओं को तीलू रौतेली राज्यस्तरीय पुरस्कार के लिए चुना गया है। साथ ही 22 आंगनबाड़ी वर्कर को भी विभागीय पुरस्कार के लिए चुना गया है। कोविड-19 के चलते आज 4 बजे सचिवालय में वर्चुअल माध्यम से यह कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।