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रक्षाबंधन पर वैदिक राखियों से सजेंगी भाई की कलाई, कीमत 10 रुपये से शुरू

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देहरादून: टिहरी जिले में इस बार राखी के त्योहार का अलग ही आनंद होगा। विदेशी वस्तुओं से परहेज करने वाले लोगों के लिए इस बार बाजार में वैदिक राखियां पेश की गई हैं। यह राखियां अनाज से बनी हैं। स्वयं सहायता से जुड़ी महिलाओं ने यह राखियां बनाई हैं, जिससे बहनों की आय में वृद्धि होगी वहीं भाई-बहन के रिश्ते और भी महकेंगे।

रक्षाबंधन के त्योहार को देखते हुए वैसे तो बाजार में दर्जनों प्रकार की राखियां उपलब्ध हैं, लेकिन जो लोग अलग तरह की राखियां खरीदना चाहते हैं, उनके लिए वैदिक राखियां भी उपलब्ध हैं। अनाज और धागों से बनी यह राखियां अब जनपद के बाजारों में उपलब्ध हैं। ऐसी राखियां आजीविका सुधार परियोजना से जुड़ी महिलाओं ने तैयार की हैं और उन्हें बाजार में उतारा है। जो लोग प्रकृति प्रेमी हैं और देशी-विदेशी कंपनियों उत्पादों को खरीदना पसंद नहीं करते हैं, उनके लिए वैदिक राखियां पहली पसंद हो सकती हैं।

स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं के स्वरोजगार के साधन बढ़ाने और उनकी आर्थिकी मजबूत करने के उद्देश्य को लेकर आजीविका सुधार परियोजना ने वैदिक राखियां तैयार कराई हैं, जिन्हें चंबा के किसान आउटलेट सेंटर में तैयार किया गया है। डोरेमोन और निंजा के साथ बाजार में छायी मोदी राखी यह भी पढ़ें राखियां बनाने वाली महिलाएं रेखा पुंडीर, सरस्वती सकलानी, सुषमा कोठारी आदि का कहना है कि जिस प्रकार रक्षा बंधन पवित्र त्योहार माना जाता है, उसी प्रकार जैविक राखियां भी पवित्र हैं।

इसमें जैविक चीजों का उपयोग किया गया है। इसलिए लोगों को इसे अधिक खरीदना चाहिए। महिलाओं ने अभी तक दो हजार राखियां तैयार कर उन्हें बाजार भेजी हैं, जिनमें एक हजार से अधिक राखियां बिक चुकी हैं। इस काम की शुरुआत पांच दिन पहले ही की गई। परियोजना के जिला प्रबंधक डॉ. हीरा बल्लभ पंत का कहना है कि परियोजना से जुड़ी महिलाएं वैसे तो कई प्रकार की गतिविधियां कर रही हैं, जिनसे उन्हें आय प्राप्त होती है, लेकिन वैदिक राखियां बनाना एक नया प्रयोग व गतिविधि है।

अभी प्रयोग के लिए इसकी शुरूआत की गई अगले वर्ष व्यापक स्तर पर वैदिक राखियां बनाई जाएंगी, ताकि इससे उनकी आय में भी बढ़ोत्तरी हो सके। इन चीजों से बनी हैं राखी भारत रक्षा पर्व: चार साल बाद बांधेंगी भाई की कलाई पर राखी यह भी पढ़ें राखियों को बनाने में पूजा में प्रयोग होने वाला नालधागा के अलावा जौ, तिल, जख्या, चैलाई, झंगोरा, नौरंगी, सोयाबीन आदि अनाजों के दानों का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा रोली का प्रयोग भी किया गया है।

पूजा आदि में प्रयोग होने वाले धागे व अनाजों का राखी बनाने में इस्तेमाल किया गया है, इसलिए इसे वैदिक राखी नाम दिया गया है। राखी की कीमत है दस रुपये राखी से पहले ही मुरझा गई बहनों की उम्मीद यह भी पढ़ें वैदिक राखियों की कीमत दस रुपये से लेकर चालीस रुपये तक रखी गई है। राखी महिलाओं के समूह द्वारा भी ब्रिकी की जा रही है। इसके अलावा ब्रिकी के लिए जगह-जगह स्टाल भी लगाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर पहली बार अनाज आदि से राखी बनाने का काम हो रहा है।